वाम-वाम-वाम दिशा...


शालिनी बाजपेयी

1925 से अपनी यात्रा शुरू कने वाला वामपंथ आज विचारों के उन दो राहों पर खड़ा है जहां से वामपंथ को पाने के बहुत कुछ है और अब शायद खोने के लिए कुछ भी नहीं। 15वीं लोकसभा के चुनावों में वामपंथ को मिले जनता के सहयोग से पता चलता है कि जनता इनके नवउदारवादी विचारों से प्रसन्न नहीं है। जो वामपंथ कल तक गरीबों, मजलूमों और मजदूरों का कहा जाता था वह आज टाटा का हो गया है। इस बदलाव को पश्चिम बंगाल की रचना ने नकार दिया है। पश्चिम बंगाल या भारत की गरीब जनता को लखटकिया कार नहीं बल्कि सोने के लिए खटिया और खाने के लिए दाल रोटी-रोटी चाहिए। इन्हीं सवालों को बुद्धदेव नहीं समझ रहे हैं और ममता इनकी इस बुद्धिहीनता का फायदा उठा रही हैं।
वामपंथी पाटिüयों में विशेषकर माकपा माक्र्सवाद सिद्धांत के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से भटक रहा है। यह अपने आपको माक्र्सवादी कहता तो है लेकिन माक्र्स के सिद्धांतों पर ही चलना नहीं चाहता है। पश्चिम बंगाल की जनता को वही वामपंथ चाहिए जो उसके सवालों को समझ सके। जो वामपंथ 14वीं लोकसभा में काफी अधिक सीटें लेकर गांधियों के पास सरकार बनाने पहुंचा था वही आज अकेले विपक्ष में भी बैठने के काबिल नहीं बचा है। इसका जि मेदार भी वह स्वयं है। यही कारण है कि यूपीए की लगाम खींचकर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून और किसानों की ऋण माफी का सारा श्रेय यूपीए ले गया और वामपंथी क्वटाटां करते रह गए। इन्हीं दो उपलçब्धयों को कांग्रेस ने जनता में खूब भुनाया और वोट बटोरे तथा वामपंथी तीसरा मोर्चा बनाते रह गए। इसके तीसरे मोर्चे के गठन ने ही इससे सबकुछ छीन लिया। इनकी छवि तो उसी दिन दागदार हो गई थी जिस दिन ये नवीन पटनायक, मायावती, जयललिता और करुणानिधि के साथ खडे़ हुए थे। जनता इनके तीसरे मोर्च से ही इनके वैचारिक भटकाव को समझ गई थी।
ये वामपंथी अहम की उस चोटी पर पहुंच गए थे जहां से इन्होंने नंदीग्राम और सिंगूर को आवाज लगाई थी। इसी सिंगूर और नंदीग्राम में न जाने कि तने गरीब किसानों को मौत के घाट उतार दिया गया, न जाने कितने बच्चों को अनाथ किया गया। इसी वामपंथ से दुखी होकर महाश्वेता देवी जैसी वामपंथी लेखिका ने भी इसके खिलाफ विरोध के स्वर तेज किए, लेकिन महाश्वेती देवी जैसे ममता की अति पर जाकर तारीफ करती हैं तो वह यह कैसे भूल जाती हैं कि ये कल तक जिन सा प्रदायिक ताकतों के साथ मजबूती से खड़ी थीं आज उनसे पूरी तरह व्यावहारिक रूप से कैसे अलग हो सकती हैं। ममता ने काफी कुछ अच्छा किया होगा लेकिन इनके राजनीतिक साथियों की छवि को देखकर इन्हें बहुत महान नहीं कहा जा सकता। जो प्रकाश करात ने कल किया था कांग्रेस के साथ जाकर वही तो ममता कर रही हैं। यह सत्ताई राजनीति की भूख को नकारकर भी उसी की तरफ बढ़ रही हैं। यह कैसा विरोधाभास है। इन्हें वास्तव में यदि जनता की राजनीति करनी थी जैसा कि महाश्वेता देवी से इन्होंने कहा है तो फिर कांग्रेस के साथ जाने की क्या जरूरत थी। ऐसी राजनीति तो ममता अकेले रहकर भी कर सकती हैं। जिस तरह से यूपीए के कुकृत्यों के लिए वामपंथियों को भी जि मेदार ठहराया जाता था, उसी तरह आज फिर यपीए के गलत-सही सभी कामों के लिए ममता को भी दोषी ठहराया जाएगा। इसलिए महाश्वेता देवी को एकतरफा होकर तारीफके पुल नहीं बांधने चाहिए। तारीफ इनकी उस दिन होगी जिस दिन ये यूपीए के साथ रहकर भी उसकी किसान विरोधी और नवउदारवादी नीतियों जो हमेशा आम जनता के कष्टों का कारण रही है, के खात्मे में अपनी भूमिका निभाएंगी।
वास्तव में देखा जाए तो महाश्वेता देवी ही क्यों वामपंथियों कुकृत्यों (सिंगूर-नंदीग्राम) पर स्वयं वामपंथ के अंदर से भी विरोध की तलवारें खींची गईं। इसका कारण साफ है कि यह भाजपा और कांग्रेस नहीं है जो अपनी बुराइयों पर पदाü डालते फिरे बल्कि यह वामपंथ है जिसमें अपनी आत्मालोचना का बड़ा महत्व है लेकिन दुभाüग्य इस बात का है कि यह सब वामपंथी अनुशासन ये माकपा कहां तज आई है।
लालगढ़ में तृणमूल की जीत ममता की जीत नहीं बल्कि वामपंथ की हार है। ममता भी जिस विरोध की राजनीति से जनता को बरगलाने में कामयाब हुईं उससे यह कब तक अपना दामन बचा पाएंगी क्योंकि केंद्र में यह जिनके साथ खड़ी हैं वह तो खुला इन्हीं लक्ष्यों को हासिल करने की बात करते हैं। वह तो अपनी उस नवउदारवादी आर्थिक नीति को जिसमें वामपंथियों ने हमेशा अड़ंगा लगाया है, अब स्वतंत्र होकर सफलतापूर्वक अंजाम देंगे। इस उदारवादी व्यवस्था का जिसका नाम उदारवादी है लेकिन यह बहुत ही जुल्मी है। जुल्मी इस अर्थ में कि इसने न जाने कितने युवाओं से उनके रोजगार छीने हैं, न जाने कितने आईआईटी छात्रों से उनका भविष्य छीना है। इसी उदारवाद में एसईजेड (स्पेशल इकोनॉमिक जोन) जैसे क्षेत्र भी आते हैं जिनका ममता विरोध करती आई हैं। उदारवाद में टाटा की लटखटिया भी आती है। यही उदारवाद सत्यम जैसे दानवों को भी पैदा करता है, जो एक बार अपना मुंह खोलता है और हजारों लोगों के भविष्य को अपने पेट रख लेता है। मनमोहन सिंह का उदारवाद अंधाधुंध सरकारी संस्थाओं का निजीकरण है। इसी ने मंदी जैसे आर्थिक सुनामी को जन्म दिया है। और जितना हमें किसानों और सरकारी संस्थाओं ने बचाया है उन्हें भी अब उसी सायनाइड में बदल दिया जाएगा। यही है उदारवाद।
अगर बुद्धदेव ने गलत किया है तो ममता भी दूध की धुली नहीं हैं, यह भी उसी भीड़ से निकलकर आई हैं जहां से बुद्धदेव जैसे नेता। पश्चिम बंगाल की जनता ने ममता को इन बुद्धदेव और कि सान विरोधी नीतियों से अलग कैसे समझ लिया। दरअसल वहां की जनता भी तो इस समय भटकाव के रास्तों पर खड़ी है क्योंकि ये नेता तो एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं वह किसे अच्छा समझे और किसे बुरा।
बुद्धदेव को अगर पश्चिम बंगाल में विकास करना ही था तो क्या यह विकास टाटा और सलेम ग्रुप के साथ मिलकर ही किया जा सकता है। यह विकास तो वर्षों से बंद पड़े कारखानों की मशीनों में नई जान डालकर भी किया जा सकता है। यदि पश्चिम बंगाल के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि कोलकाता सबसे समृद्ध और औद्योगिक नगरी के रूप में जाना जाता था। कोलकता की समृद्धता और आधुनिकता ने ही अंग्रेजों को कोलकाता को भारत की राजधानी बनाने के लिए प्रेरित किया था। पहले भारत में दूर-दूर से लोग कोलकता में रोजगार ढूंढ़ने आते थे लेकिन अब तो यह अपने क्षेत्र के युवाओं को ही रोजगार नहीं दे पा रहा है तो और राज्यों के लिए कैसे गिले-शिकवे। बुद्धदेव को उन बंद पड़े कारखानों को फिर से उस तरह से चलाने होंगे जैसे पहले चलते थे और कोलकाता की अपनी पहचान वापस लानी होगी। विकास की ओर बढ़ने के लिए पहले पायदान पर तो खेती आती है। भारत की लगभग 60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष रूप से और 40 प्रतिशत अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर आçश्रत है फिर खेती-किसानी के साथ इतना सौतेला व्यवहार क्यों? पश्चिम बंगाल वैसे भी जूट, चाय बागान और चावल के लिए मु य रूप से जाना जाता है, इसकी इन मु य फसलों को और बढ़ावा देना चाहिए ताकि खेती पर आçश्रत जनता को कम से कम भूखों न मरना पड़े और मौका पड़ने पर इन उदारवादी समर्थकों को डूबने से भी बचाने के लिए तिनका बन सके। वामपंथी पश्चिम बंगाल में आए भी अपने इन्हीं कुछ सवालों को लेकर थे मसलन- औद्यागिक विकास, सामाजिक न्याय और किसान मजदूरों के सवाल। वामपंथियों ने ऑपरेशन बरगा भी चलाया था भूमि सुधार के लिए, लेकिन यह सब अब कहां छू-मंतर हो गया है। यह जिस सामाजिक न्याय की बात करते थे वह भी तो बंगाल में सिरे से गायब है। कहा जाता है कि बंगाल में तो अल्पसं यकों की स्थिति और भी खराब है। समूचे भारत में जिस तरह अल्पसं यकों को आतंकवाद के नाम उत्पीçड़त किया जा रहा है, बंगाल इससे अछूता नहीं है। वहां पर भी अल्पसं यकों की यही दशा है। इसी का नतीजा था कि इस बार अल्पसं यकों ने भी वामपंथियों को किनारे लगाया है।
ममता बनर्जी जो कभी भाजपा का पल्लू पकड़े थीं आज कांग्रेस के साथ खड़ी हैं। यह पश्चिम बंगाल में कोई चमत्कार तो कर नहीं देंगीं। ऐसा भी नहीं है कि बंगाल में ममता के सत्ता में आ जाने से कोई क्र ांतिकारी बदलाव हो गया है बल्कि स्थितियां वही हैं। यह तो नई बोतल में पुरानी शराब परोसने जैसा है। मतलब चेहरे अलग-अलग हैं लेकिन विचार वही हैं। कोेलकाता की जनता भी इस बात को समझ रही है। यदि वह न समझती होती तो इतने दशकों से वह वामपंथियों का साथ न दे रही होती। वहां की जनता ने ही तो लाल झंडों को इतना ऊंचे उठाया है। वहां का बुद्धजीवी वर्ग भी विचारों की राजनीति पर ही बल देता है। कोलकाता का माहौल भी भारत की और जगहों से बिल्कुल अलग है।
वामपंथ के पास अब भी समय है। वह जनता से अपने कुकृत्यों यानी सिंगूर और नंदीग्राम के लिए माफी मांगे और वामपंथी अनुशासन के तहत अपनी आत्मालोचना करे। इसे अपनी इस सत्ताई राजनीति को छोड़कर जन संघर्षों की राजनीति करनी चाहिए। और इन जन संघर्षों की राजनीति में सांसदों की सं या मायने नहीं रखती है। इस माकपा को इस बात को समझना चाहिए कि अभी भी भारत में वामपंथी ही ऐसी पाटिüयां हैं जिनमें मजबूत जनसंगठनों की ताकत है। मौका पड़ने पर यह करोड़ों की सं या में जनता को जन मुद्दों के लिए सड़कों पर उतार सकती हैं और इतिहास जानता है कि कई बार ऐसा हुआ भी है। इसलिए वामपंथी पाटिüयों को इस कुर्सी की राजनीति से इतर हटकर अपने पुराने रोल में वापस आना होगा। भाकपा-माकपा-भाकपा माले ये तीनों एक होकर इस राजनीतिक मंच को जनसंघर्षों का मंच बनाएं। और संसद में अपनी विपक्षी भूमिका को जनता के हित में ईमानदारी से निभाते हुए समय-समय पर कांग्रेस को बेकाबू होने से रोकें।

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