पत्रकारिता के एक युग का अंत



अम्बरीश कुमार

जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी नहीं रहे .जनसत्ता जिसने हिंदी पत्रकारिता की भाषा बदली तेवर बदला और अंग्रेजी पत्रकारिता के बराबर खडा कर दिया .उसी जनसत्ता को बनाने वाले प्रभाष जोशी का कल देर रात निधन हो गया । दिल्ली से सटे वसुंधरा इलाके की जनसत्ता सोसाईटी में रहने वाले प्रभाष जोशी कल भारत और अस्ट्रेलिया मैच देख रहे थे । मैच के दौरान ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा । परिवार वाले उन्हें रात करीब 11.30 बजे गाजियावाद के नरेन्द्र मोहन अस्पताल ले गए , जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया । प्रभाष जोशी की मौत की खबर पत्रकारिता जगत के लिए इतनी बड़ी घटना थी कि रात भर पत्रकारों के फोन घनघनाते रहे । उनकी मौत के बाद पहले उनका पार्थिव शरीर उनके घर ले जाया गया फिर एम्स । इंदौर में उनका अंतिम संस्कार किया जाना तय हुआ है , इसलिए आज देर शाम उनका शरीर इंदौर ले जाया जाएगा ।
प्रभाष जोशी जनसत्ता के संस्थापक संपादक थे।मालवा प्रभाष जोशी ने नई दुनिया से पत्रकारिता की शुरुआत की थीऔर जनसत्ता में देशज भाषा का नया प्रयोग भी उन्होंने किया । पत्रकार राजेन्द्र माथुर और शरद जोशी उनके समकालीन थे। नई दुनिया के बाद वे इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े और उन्होंने अमदाबाद और चंडीगढ़ में स्थानीय संपादक का पद संभाला। 1983 में दैनिक जनसत्ता का प्रकाशन शुरू हुआ, जिसने हिन्दी पत्रकारिता की भाषा और तेवर बदल दिया ।जनसत्ता सिर्फ अखबार नहीं बना बल्कि ९० के दशक का धारदार राजनैतिक हथियार भी बना। पहली बार किसी संपादक की चौखट पर दिग्गज नेताओ को इन्तजार करते देखा। यह ताकत हिंदी मीडिया को प्रभाष जोशी ने दी ,वह हिंदी मीडिया जो पहले याचक मुद्रा में खडा रहता था । इसे कैसा संयोग कहेंगे की ठीक एक दिन पहले लखनऊ में उन्होंने हाथ आसमान की तरफ उठाते हुए कहा -मेरा तो ऊपर भी इंडियन एक्सप्रेस परिवार ही घर बनेगा .इंडियन एक्सप्रेस से उनका सम्बन्ध कैसा था इसी से पता चल जाता है . प्रभाष जोशी करीब 3० घंटे पहले चार नवम्बर की शाम लखनऊ में इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर में जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों के बीच थे .आज यानी छह नवम्बर को तडके ढाई बजे दिल्ली से अरुण त्रिपाठी का फोन आया -प्रभाष जी नहीं रहे .मुझे लगा चक्कर आ जायेगा और गिर पडूंगा .चार नवम्बर को वे लखनऊ में एक कर्यक्रम में हिस्सा लेने आये थे .मुझे कार्यक्रम में न देख उन्होंने मेरे सहयोगी तारा पाटकर से कहा -अम्बरीश कुमार कहा है .यह पता चलने पर की तबियत ठीक नहीं है उन्होंने पाटकर से कहा दफ्तर जाकर मेरी बात कराओ .मेरे दफ्तर पहुचने पर उनका फोन आया .प्रभाष जी ने पूछा -क्या बात है ,मेरा जवाब था -तबियत ठीक नहीं है .एलर्जी की वजह से साँस फूल रही है .प्रभाष जी का जवाब था -पंडित मे खुद वहां आ रहा हूँ और वही से एअरपोर्ट चला जाऊंगा .कुछ देर में प्रभाष जी दफ्तर आ गये .दफ्तर पहली मंजिल पर है फिर भी वे आये .करीब डेढ़ घंटा वे साथ रहे और रामनाथ गोयनका ,आपातकाल और इंदिरा गाँधी आदि के बारे में बात कर पुराणी याद ताजा कर रहे थे. तभी इंडियन एक्सप्रेस के लखनऊ संसकरण के संपादक वीरेंदर कुमार भी आ गए जो उनके करीब ३५ साल पराने सहयोगी रहे है .प्रभाष जी तब चंडीगढ़ में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे .एक्सप्रेस के वीरेंदर नाथ भट्ट ,संजय सिंह ,दीपा आदि भी मौजूद थी .
तभी प्रभाष जी ने कहा .वाराणसी से यहाँ आ रहा हूँ कल मणिपुर जाना है पर यार दिल्ली में पहले डाक्टर से पूरा चेकउप कराना है.दरअसल वाराणसी में कार्यक्रम से पहले मुझे चक्कर आ गया था .प्रभाष जोशी की यह बात हम लोगो ने सामान्य ढंग से ली .पुरानी याद तजा करते हुए मुझे यह भी याद आया की १९८८ में चेन्नई से रामनाथ गोयनका ने प्रभाष जोशी से मिलने को भेजा था तब मे बंगलोर के एक अखबार में था ..पर जब प्रभाष जोशी से मिलने इंडियन एक्सप्रेस के बहादुर शाह जफ़र रोड वाले दफ्तर गया तो वहां काफी देर बाद उनके पीए से मिल पाया .उनके पीए यानि राम बाबु को मैंने बतया की रामनाथ गोयनका ने भेजा है तो उन्होंने प्रभाष जी से बात की .बाद बे जवाब मिला -प्रभाष जी के पास तीन महीने तक मिलने का समय नहीं है ..ख़ैर कहानी लम्बी है पर वही प्रभाष जोशी बुधवार को मुझे देखने दफ्तर आये और गुरूवार को हम सभी को छोड़ गए .
लखनऊ के इंडियन एक्सप्रेस की सहयोगियों से मैंने उनका परिचय कराया तभी मौलश्री की तरफ मुखातिब हो प्रभाष जोशी ने कहा था -मेरा घर तो ऊपर भी इंडियन एक्सप्रेस परिवार में ही है .हम सब कुछ समझ नहीं पाए .उसी समय भोपाल से भास्कर के पत्रकार हिमांशु वाजपई का फोन आया तो हमने कहा-प्रभाष जी से बात कर रहा हु कुछ देर बात फोन करना . काफी देर तक बात होती रही पर आज उनके जाने की खबर सुनकर कुछ समझ नहीं आ रहा .भारतीय पत्रकारिता के इस भीष्म पितामह को हम कभी भूल नहीं सकते .मेरे वे संपादक ही नहीं अभिभावक भी थे..यहाँ से जाते बोले -अपनी सेहत का ख्याल रखो .बहुत कुछ करना है.प्रभाष जी से जो अंतिम बातचीत हुईं उसे हम जल्द देंगे .प्रभाष जोशी का जाना पत्रकारिता के एक युग का अंत है .

लोकतंत्र में राजशाही के नामलेवा

विजय प्रताप

राजस्थान में आजादी पूर्व कोटा रियासत के महाराव थे, बृजराज सिंह। आजादी के बाद जब सभी रियासतों के अधिकार छीने जाने लगे तो इसका सबसे ज्यादा व संगठित प्रतिरोध राजस्थान के रजवाड़ों ने किया। यहां राजाओं ने न केवल चुनाव लड़ा बल्कि कई आम चुनावों तक राजस्थान में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुलने दिया। उसी दौरान बृजराज सिंह भी अखिल भारतीय स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर झालावाड़ से सांसद चुने गए। स्वतंत्र पार्टी का सूरज अस्त होने के बाद जनसंघ से राजनीति की और फिर राजनीति से सन्यास ले लिया। बृजराज सिंह कहने को तो लोकसभा में जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, लेकिन वास्तव में वह आजादी के बाद नई राजनैतिक व्यवस्था में अपनी रियासत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। यही हाल राजस्थान के अन्य सांसद रूपी राजाओं का भी था। अस्सी वर्शीय बृजराज सिंह अपनी जीवन शैली व कार्यप्रणाली में अभी भी 60 साल पहले के भारत में जीते हैं। अपने महलों की चारदीवारी से बाहर सार्वजनिक जीवन में भी एक राजा से कम जैसा बर्ताव नहीं करते। प्रषासन को विभिन्न समस्याओं पर अपने विषेश लेटर पैड जो उनकी पूर्व रियासत व उन्हें महाराव के रूप में प्रतिबिम्बित करता है पर रोजना एक पत्र लिखते हैं, और जनता के समस्याओं पर ध्यान देने की सलाह देते हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट से उनके पुत्र इज्यराज सिंह संसद पहुंचे। वेषभूशा में अत्याधुनिक से दिखने वाले युवा इज्यराज सिंह ने विदेष से पढ़ाई की है। सार्वजनिक सभाओं में खुले दिल से प्रगतिषील बातें करते हैं। लेकिन यह विचारों का खुलापन उनके महल की चारदीवारियों में जाते ही जड़ हो जाता है। फिर वह लोकतंत्र प्रतिनिधित्व करने की बजाए एक पूर्व रियासत के ‘महाराज कुमार’ होते हैं। उनकी कार्यप्रणाली व जीवनषैली भी बृजराज सिंह का अनुषरण करती दिखती है। पिछले दिनों हमारे एक मित्र ने उनकी कुछ तस्वीरें दिखाई। यह नवरात्र के दौरान उनके महल में देवी पूजन से पहले की तस्वीरें थी। पूजा स्थल पर लग्जरी वाहन से उतरने के तुरंत बाद एक वृद्ध दिखने वाला व्यक्ति, उनका थाली में पैर धुलकर स्वागत करता है। हमारे यहां पैर धुलने की परंपरा काफी पुरानी है। वह उसी का निर्वहन करते दिखता है। लेकिन आष्चर्य तब होता हैै, जब दूसरी तस्वीर में वह उस पैर धुले पानी को मुहं से लगाकर पी जाता है। उस दौरान भी इज्यराज सिंह के चेहरे पर कोई शिकन नहीं पड़ती बल्कि उसकी जगह हमेशा तैरने वाली एक हल्की ‘निर्लज्ज’ मुस्कान दिखती है। एक सांसद का ऐसा व्यवहार मुझे लोकतंत्र के लिए घातक लगता है। यह तस्वीर अखबार में प्रकाषित हो जाती तो एक राजनैतिक तूफान जरूर खड़ा करती। तस्वीर हमारे अखबार के मुख्य संवाददाता भी देखते हैं, लेकिन उन्हें उसमें कोई खास बात नजर नहीं आती। वह इसे परंपरा बता आया-गया कर उन्हें ऐसा करते देख मुझे बड़ी कोफ्त होती है, लेकिन मैं कुछ नहीं कर पाता।
इज्यराज सिंह के लिए भी यह एक सामान्य राजषाही परंपरा थी। वह सार्वजनिक जीवन में ऐसी कई और परंपराओं का निर्वहन बेहिचक करते हैं, जिसे गणतंत्र की स्थापना के समय लोकतंत्र विरोधी मानकर त्याग ने का संकल्प लिया गया था। वह आज भी दषहरे के दिन अपने महल में शहर के सभी बड़ी हैसियत वाले लोगों को बुलाकर उनका स्वागत करते हैं। इसे ‘दरी खाने’ की रस्म कहा जाता है। इस दौरान सभी राजशाही वेषभूशा में सजे ये लोग किसी पुराने राजघराने के राजा-महराजाओं की याद दिलाते हैं। कोटा में दशहरा के दिन रावण दहन से पहले राजघराने के राजकुमार द्वारा रावण के अमृत-कलश को तीर धनुश से वेधने की परंपरा है। इज्यराज सिंह सांसद बनने से पहले भी इस परंपरा का निर्वहन करते रहे हैं और सांसद बनने के बाद भी इस वर्श इस परंपरा का निर्वहन करते दिखे। वह जब कभी अपने संसदीय क्षेत्र में होते हैं तो एक पत्रकार के रूप में उनसे अक्सर सामना होता है, लेकिन मेरे लिए यह समझ पाना मुष्किल होता है कि वह एक सांसद के रूप में हैं या ‘महाराज कुमार’ के रूप में। इसके कुछ वाजिब कारण भी हैं। वह जितने दिन भी shहर में होते हैं सरकारी वाहन से चलने की बजाए अपने निजी वाहन से चलते हैं। सरकार का पैसा बचाने के लिए नहीं बल्कि कुछ और कारणों से। शायद यह भी उनके निजी जीवन का कोई राजशाही निर्णय हो। उनका वाहन चालक एक विशेष वर्दी में रहता है। उसकी वर्दी पर लगे सितारे और कुछ निषानों से यह जान पड़ता है किसी कोटा रियासत का कारिंदा है। सार्वजनिक सभाओं में छुट्टभैय्ये नेता एक सांसद के रूप में कम महाराज कुमार के रूप में ज्यादा जयकार करते हैं।
सांसद इज्यराज सिंह को इस रूप में देखकर मुझे अक्सर कांग्रेस के एक नेता की प्रेस वार्ता याद आती है। लोकसभा चुनाव में जीत के कुछ महीनों बाद कांग्रेस ने एक सरर्कुलर जारी कर अपने सभी नेताओं व सांसदों से अपील की थी कि वह पूर्व राजशाही व उससे जुड़े पदनामों का प्रयोग न करें। यह भारतीय संविधान की मूल अवधारणा के खिलाफ है। कांग्रेस ने मीडिया से भी ऐसे लोगों का नाम लिखते समय पूर्व महाराजा, राजकुमार या राजकुमारी षब्द का प्रयोग नहीं करने की अपील की गई थी। यह कदम कांग्रेस चुनाव से पहले नहीं उठा सकती थी क्योंकि उसी ने सबसे ज्यादा राजा-महाराजाओं और उनके परिवार वालों को टिकट दिए। उस समय राजपरिवार का सदस्य होना जीत की गांरटी की तरह थी क्योंकि ऐसे लोगों के पास इफरात में पैसा होता है जिससे वह किसी को भी खरीदने की हैसियत रखते हैं। ऐसे लोगों पर पार्टी को भी कम खर्च करना पड़ता है।
राजस्थान की 25 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस ने करीब 6 व भाजपा ने 5 पूर्व राजपरिवार सदस्यों को टिकट दिए। इज्यराज सिंह उसी में से एक हैं। लोकतंत्र में आमजन या पार्टी कार्यकर्ताओं की बजाए ऐसे सामंती तत्वों को प्रश्रय देना राजनैतिक पार्टियों की आखिर कौन सी मजबूरी है? कौन सी मजबूरी कांग्रेस को इज्यराज सिंह जैसे राजशाही के गर्त में डूबे लोगांे को साथ लेकर चल रही है। दरअसल हकीकत में कांग्रेस का राजतंत्र विरोध केवल दिखावा मात्र है। संविधान की किताब में राजा-महाराजओं का वजूद तो खत्म हो गया लेकिन रस्सी की ऐंठन आज भी बाकी है। आज भी कांग्रेस के ऐसे नेता अपने क्षेत्रों में किसी सांसद या जनप्रतिनिधि की हैसियत की बजाए पूर्व महाराजा, राजकुमार, या राजकुमारी के रूप में ही जाना पसंद करते हैं। इसी में वह अपना वजूद तलाषते हैं।
तस्वीरे भी कुछ कहती हैं


जेलों में सड़ने को अभिशप्त हैं मुस्लिम युवा

आतंक के नाम पर व्यवस्था एक समुदाय विशेष को प्रताड़ित करने के लिए कौन-कौन से तौर-तरीके अपना सकती है, वह हाल की कुछ घटनाओं से समझा जा सकता है। आतंकी घटनाओं के नाम पर पुलिस ने थोक के भाव मुस्लिम युवको की गिरफ्तारी की। पुलिस व सत्ता का यह उत्पीड़न यहीं नहीं रूका बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत उन पर इतने केस लाद दिए गए ताकि वह जीवन भर जेल में सड़ने पर मजबूर हों। अगस्त 2009 में उर्दू मासिक पत्रिका अफकार-ए-मिल्ली में अबु जफर आदिल आजमी का एक महत्वपूर्ण लेख प्रकाषित हुआ। इसका अंग्रेजी अनुवाद मुमताज आलम फलाही ने किया है. प्रस्तुत है उसका हिंदी रूपान्तरण-

यह सच है कि अन्याय व दुहारे मापदंडों के साथ कोई भी समाज बहुत दिन तक नहीं चल सकता। दुर्भाग्य से भारत तेजी से इन्हीं मापदंडों की ओर बढ़ रहा है। आंतकवाद के मामले में मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी व न्याय में पुलिस, प्रशासन व न्यायापालिका का दुहरा मापदंड साफ नजर आता है।
2008 में देश में कई विध्वंसकारी धमाकों में सैकड़ों लोग मारे गए और घायल हुए। फलस्वरू, सैकड़ों मुस्लिम युवाओं को आतंकी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। आतंकवाद के नाम पर मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी का आंकड़ा हर साल बढ़ रहा है। 2007 में उत्तर प्रदेश की अदालतों में हुए धमाके के बाद गिरफ्तारी की प्रक्रिया में तेजी आई है। मुस्लिम युवकों के खिलाफ चल रहे मामलों को देखे तो ऐसा लगता है कि पुलिस व प्रषासन जानबूझ कर इन केस पर केस थोप रही हैं। इन मामलों के सुनवाई की जो गति है उससे यह तय है कि ये सभी कभी भी बाहर नहीं आ सकेगें।
आतंकवाद के मामले में पुलिस की जांच प्रक्रिया पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन हाल में मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी के बाद उन पर जैसे 40-40, 50-50 केस थोपे गए हैं यह एक बड़े शडयंत्र का हिस्सा लगता है। आतंक के मामले में बहुत से मुस्लिम युवकों पर पुलिस आरोप साबित नहीं कर सकी और अदालतों ने उन्हें मुक्त भी कर दिया। लेकिन षड़यंत्र के तहत उन्हें हाल के विस्फोटों में फिर से फंसाया गया।
जुलाई 2008 में अहमदाबाद श्रृंखलाबद्ध विस्फोट व सूरत से दर्जनों जिंदा बमों की बरामदगी के मामले में सूरत पुलिस ने 35 मामलों में 102 लोगों को दोशी माना। इसमें से 52 को गिरफ्तार किया गया और लगभग सभी मामलों में दोशी बताया गया। मई 2008 में जयपुर धमाकों के बाद 8 मामलों में 11 लोगों को दोशी बताया गया। चार की गिरफ्तारी हुई। सितम्बर 2008 में दिल्ली श्रृंखलाबद्ध विस्फ्ोट के बाद 8 मामले में 28 लोगों को दोषी बताया गया। इसमें 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया। मुबंई पुलिस ने इंडियन मुजाहिद्दीन के सदस्य के नाम पर 21 लोगों को गिरफ्तार किया।
मुंबई पुलिस की अपराध शाखा ने सादिक शेख को देश के हालिया सभी विस्फोटों का मुख्य षड़यंत्रकारी बताया। पुलिस ने मैकेनिकल इंजीयर 38 वर्षीय सादिक शेख इंडियन मुजाहिदीन का संस्थापक सदस्य बताया। उसने अपने पाकिस्तानी मित्र आमीर रजा की मदद से देश में विस्फ्ोटों का षड़यंत्र रचा। पुलिस के अनुसार शेख 2005 के बाद देश में हुए सभी धमाकों में संलिप्त था। उसने 2001 में पाकिस्तान जाकर हथियार चलाने का प्रषिक्षण लिया तथा मुबंई व आजमगढ़ के कई युवाओं को इस प्रषिक्षण के लिए पाकिस्तान भेजा। उस पर अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता व मुबंई धमाकों के मामले में 52 मुकदमें कायम किए गए। उसे 11 अन्य के साथ 11 जुलाई को मुबंई की लोकल ट्नों में हुए धमाकों के मामले में भी दोषी माना गया। उसे मकोका में गिरफ्तार किया गया। उसने टीवी चैनलों के सामने इन सभी मामलों में अपनी संलिप्तता कबूल की। जिसके बाद मुंबई अपराध शाखा ने इस केस को एटीएस के हवाले कर दिया। एटीएस ने मामले को हाथ में लेते ही कोर्ट से टीवी चैनलों पर दिखाए जा रहे उसके कबूलनामे पर तुरंत रोक लगाने की मांग की। अदालत ने एटीएस की अपील कबूल कर ली। अपनी जांच में एटीएस ने सादिक शेख को क्लीनचिट दे दी और मकोका कोर्ट में उसके 11 जुलाई को मुबंई की लोकल टे्न धमकों के मामले में किसी भी तरह की संलिप्तता से इंकार किया। एटीएस के अनुसार शेख ने इस मामले में शेख ने बाटला हाउस मुठभेड़ में मारे गए अतीफ अमीन के दबाव में आकर इस ब्लास्ट में खुद को षामिल होना बताया था। हालांकि एटीएस इस बात का जवाब नहीं दे सकी कि अतीफ ने कब और क्यों उस पर दबाव दिया जबकि इंडियन मुजाहिदी में वह शेख से जूनियर था।
इस धमाकों में मुहम्मद सैफ को भी मुख्य दोषी बताया गया। आजमगढ़ के संजरपुर गांव के सैफ ने दिल्ली से इतिहास में एमए किया था। वह अंग्रेजी व कम्प्यूटर साफ्टवेयर का भी कोर्स कर रहा था। बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद पुलिस ने सैफ को उसके फ्लैट से गिरफ्तार किया था। 23 वर्शीय सैफ पर दिल्ली, जयपुर, अहमदाबाद और सूरत विस्फोट के मामलें में 45 केस लगाए। उस पर आरोप था कि उसने इन शहरों में बम रखे। उधर, उत्तर प्रदेश पुलिस ने उसे अदालतों में विस्फोट मामले में भी संलिप्त बताया। पुलिस ने उसे संकट मोचन मंदिर व बनारस रेलवे स्टेशन पर हुए विस्फोट मामलों में पूछताछ के लिए कई दिनों तक पुलिस अभिरक्षा में रखा लेकिन अभी तक इस मामले में कोई चार्जषीट नहीं दे सकी।
मंसूर असगर को इंडियन मुजाहिद्दीन के नाम से मेल भेजने के आरोप में पुणे से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी से केवल एक माह पहले मंसूर ने 19 लाख रूपए सलाना पैकेज पर याहू में मुख्य इंजीनियर के पद पर ज्वाइन किया था। उस पर मुंबई, अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली व हैदराबाद विस्फोटों के षडयंत्र रचने व साइबर अपराध के मामले में 40 से ज्यादा केस दर्ज किए गए।
मुफ्ती अबुल बशर को गुजरात पुलिस व यूपी एटीएस ने संयुक्त रूप से उसके गांव बीनापारा से 14 अगस्त, 2008 को गिरफ्तार किया। लेकिन उसकी गिरफ्तारी चारबाग रेलवे स्टेषन से दिखाई गई। उसे इंडियन मुजाहिद्दीन के मुखिया और अहमदाबाद विस्फोटों का मास्टरमाइंड बताया गया। आज उस पर अहमदाबाद, सूरत, हैदराबाद और बलगाम विस्फोट के मामले में 40 से अधिक केस चल रहे हैं।
कयामुद्दीन कपाड़िया को जनवरी 2009 में मध्यप्रदेश से गिरफ्तार किया गया। लेकिन उसके परिजनों का कहना है कि वह गिरफ्तारी के पांच माह पहले से ही लापता था। उस पर सिमी का वरिश्ठ सदस्य होने, गुजरात और केरल के जंगलों में प्रषिक्षण शिविर लगाने और अहमदाबाद, सूरत, और दिल्ली विस्फोटों में शामिल होने का आरोप लगाया गया। उस पर भी अलग-अलग राज्यों में 40 से अधिक केस चल रहे हैं।
आजमगढ. के असरोली गांव निवासी 38 वर्शीय आरिफ बदरूद्दीन शेख को मुबंई पुलिस ने बम बनाने का विषेशज्ञ बताया। उसे 2005 के बाद देश में हुए सभी धमाकों से जोड़ा गया। आरिफ के पिता मानसिक रूप से कमजोर थे। उसकी गिरफ्तारी के दो माह बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। आरिफ की अंधी मां अपनी बेटी की ससुराल में टूटी-फूटी झोपड़ी में दिन गुजार रही है। आरिफ पर भी मुबंई, दिल्ली, अहमदाबाद व सूरत धमाके के मामले में 41 केस चल रहे हैं।
सैफुर रहमान को मध्य प्रदेश एटीएस ने जबलपुर से अप्रैल 2009 में तब गिरफ्तार किया गया जब वह अपनी बहन को आजमगढ़ से उसकी ससुराल मुबंई लेकर जा रहा था। दोनों गोदान एक्सप्रेस में सफर कर रहे थे। एटीएस ने उसकी बहन को भी 12 घंटे हिरासत में अवैध तरीके से बिठाए रखा। सैफुर रहमान को अहमदाबाद और जयपुर विस्फोटों का दोषी बताया गया। उसने भोपाल में अदालत के सामने इन विस्फोटों में शामिल होना स्वीकार भी कर लिया, लेकिन जयपुर में मजिस्ट्ेट के सामने उसने इन विस्फोटों में षामिल होने से इंकार कर दिया। मजिस्टे्ट के सामने उसने कहा कि म प्र एटीएस ने उसे प्रताड़ित किया और उसकी बहन से बलात्कार करने की धमकी दी। एटीएस के दबाव में उसने अदालत में विस्फोेटो में अपनी संलिप्तता की बात कही थी। जयपुर एटीएस ने अदालत से उसके नार्को टेस्ट की अनुमति भी मांगी जिसे अदालत ने खारिज कर दिया।
इसके विपरित एक नाटकीय घटनाक्रम में जयपुर विस्फोटों के कथित आरोपी शाहबाज हुसैन ने अदालत में खुद को निर्दोश साबित करने के लिए नार्को व अन्य टेस्ट कराने की गुजारिश की। यह देष में अपनी तरह का पहला ऐसा मामला था जब एक कथित दोश्ज्ञी ने खुद ही नार्को टेस्ट की मांग की। अभियोजन पक्ष ने उसकी मांग का विरोध किया, जिसके आधार पर मजिस्ट्ेट ने उसकी मांग अस्वीकार कर दी।
ये हाल के बम विस्फोटों में गिरफ्तार 200 लोगों में से कुछ प्रमुख नाम हैं। इन केसों में अभी गिरफ्तार लोगों से कहीं ज्यादा फरार है। पुलिस और सरकार इन मामलों में जगह-जगह मानवाधिकार का हनन किया। मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी के बाद उन पर केस लाए गए। यह देश के इतिहास में अपनी तरह का दुर्लभ उदाहरण है। सादिक शेख पर 54 केस चल रहे हैं। इसमें अभी कई मामलों में उसे पुलिस ने रिमांड पर नहीं लिया है। अगर पुलिस उसे हर केस के लिए 14 दिन की रिमांड पर भी ले तो 2 वर्श उसे पुलिस रिमांड में ही गुजारने होंगे। दोशियों को एक से दूसरे राज्य ले जाने में जो समय लगेगा वो अलग है। अब कल्पना की जा सकती है, कि सुनवाई से पहले आरोप पत्र भरने में कितना समय लगेगा जो कि भारतीय कानून के मुताबिक किसी भी अपराधी की सुनवाई से पहले भरना जरूरी होता है।
कई ऐसी भी खबरें हैं जिसमें इन कथित दोशियों को पुलिस हिरासत के अलावा जेल में भी प्रताड़ित किया गया और उन पर केस लादे गए। गुजरात में साबरमती जेल में बंद आरोपियों पर चल रहे केसों में एक केस जेल में रहते हुए दर्ज किया गया। एक के बाद एक केस लगाए जा रहे हैं मुकदमों के संबंध में जामिया साॅलिडेरिटी गु्रप की नेता मनीशा सेठी कहती हैं कि सरकार केसों को जटिल बनाकर अपना पीछा छुड़ना चाहती है। आतंक के खिलाफ युद्ध जैसी आयातित अवधारणा को कांग्रेस बढ़ावा दे रही हैै और मुस्लिमों के खिलाफ उसे हथियार की तरह प्रयोग कर रही है। संजरपुर संघर्श समिति के अध्यक्ष मसीहुद्दीन कहते हैं कि अब इन लोगों को खुद को बेकसूर साबित करने के लिए यह जीवन भी कम पड़ेगा।
जमाते-उलेमा-ए-हिंद की तरफ से सादिक शेख का मुकदमा लड़ रहे वकील शाहीद आजमी के अनुसार यह षिक्षित मुस्लिम युवकों की जिंदगी जेलों में सड़ाने की साजिश है। यही तरीका नक्सलवादियों के खिलाफ भी अख्तियार किया जा चुका है। नक्सलवादियों में कई आज भी 30 सालों से जेलों में है और उन पर 70-80 से केस हैं। पीयूसीएल के उत्तर प्रदेश के संयुक्त सचिव राजीव यादव कहते हैं कि पुलिस व सरकार का यह तरीका अमरिका से आयातित है। वहां यही तरीका काले नीग्रो लोगों के खिलाफ अपनाया गया। वे या तो इतना केस लाद देना चाहते हैं जिसमें छुटना मष्किल हो या 200-250 सालों के जेल में डाल देना चाहते हैं।
गिरफ्तार युवकों के परिजन और संबंधी गूंगे बहरे की तरह केस की संख्या और जटिलता देखने पर मजबूर हैं।

आतंकी घटनाओं के संबंध में विभिन्न जगहों से गिरफ्तार आरोपियों पर दर्ज मुकदमे

नाम - अहमदाबाद - सूरत - दिल्ली - मुबंई - जयपुर - अन्य - योग
सदिक शेख - 20 - 15 - 5 - 1 - 0 - हैदराबाद/कोलकाता - 54
आरिफ बदर - - 20 - 15 - 5 - 1 - 0 - 41
म्सूर असगर - - 20 - 15 - 5 - 1 - 0 - 41
मो सैफ - 20 - 15 - 5 - 5 - 0 - 45
मुफ्ती अबुल बशर - 21 - 15 - 0 - 0 - 0 - बेलगाम/हैदराबाद - 40
सैफुर रहमान - 20 - 15 - 6 - 0 - 0 - 40
कयामुद्दीन कपाड़िया - 21 - 15 - 5 - 0 - 0 - इंदौर - 40
जावेद अहमद सागीर 21 - 15 - 0 - 0 - 0 - 36
गयासुद्दीन - 21 - 15 - 0 - 0 - 0 - 36
जाकिर शेख - 20 - 15 - 1 - - 36
साकिब निसार - 20 - 15 - 5 - 0 - 0 - 40
जीशान - 20 - 15 - 5 - 0 - 0 - 40

पुलिस ने उनकी चार्जषीट को भी तोड़मरोड़ कर पेश किया। अहमदाबाद व सूरत के 35 मामलों में पुलिस ने 60 हजार पेजों की आरोप पत्र पेश किया। मुबंई अपराध ब्यूरो ने 18 हजार पेजों का आरोप पत्र पेष किया। इसी प्रकार जयपुर विस्फोट के मामले में 12 हजार पेजों का आरोप पत्र पेश किया गया। सभी आरोप पत्र हिंदी, मराठी व गुजराती में हैं, यदि यह मामले सुप्रीम कोर्ट तक जाते हैं तो आरोप पत्रों को अंग्रेजी में अनुवाद करने में और ज्यादा परिश्रम व समय की जरूरत होगी।


विभिन्न मामलों में दर्ज मुकदमे व आरोप पत्र

शहर - केसों की संख्या - आरोपी - गिरफ्तार - आरोप पत्र के पेज
अहमदाबाद/सूरत - 36 - 102 - 52 - 60000
मुंबई - 1 - 26 - 21 - 18009
जयपुर - 8 - 11 - 4 - 12000
दिल्ली - 7 - 28 - 16 - 10000

अभियोजन पक्ष इन सभी मामलों में चष्मदीदों की भीड़ भी जुटा चुका है। हर केस में 50-250 चष्मदीद गवाह हैं। अहमदाबाद व सूरत केस में तो कई दोशी विस्फोट के पहले से ही जेलों में हैं। उदाहरण के लिए सफदर नागौरी, षिब्ली, हाफिज, आमील परवेज सहित 13 अन्य को 27 मार्च 2008 को ही मध्य प्रदेश से गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उन्हें अहमदाबाद व सूरत मामले का मुख्य आरोपी बताया गया। इसी तरह राजुद्दीन नासिर, अल्ला बक्ष और मिर्जा अहमद जून 2008 से कर्नाटक पुलिस की हिरासत में थे, लेकिन उन्हें भी अहमदाबाद व सूरत मामलों का दोशी बताया गया।
एडवोकेट शाहिद आजमी कहते हैं कि साजिश रचने का आरोप एक हथियार की तरह है जिसे पुलिस कभी भी किसी भी मामले में प्रयोग कर सकती है। आफकार-ए-मिल्ली से बातचीत में वह कहते हैं कि अफजल मुतालिब उस्मानी जिसे 24 सितम्बर को मुंबई से गिरफ्तार दिखाया गया, उसे वास्तव में 27 अगस्त को लोकमान्य टर्मिनल से पकड़ा गया था। वह अपने घर वह अपने घर से गोदान एक्सप्रेस पकड़ मुंबई पहुंचा था। हमने संबंधित अधिकारियों को तुरंत टेलीग्राम से इसकी सूचना दी लेकिन उन्होंने नजरअंदाज कर दिया। 28 अगस्त को उसे मेट्ोपोलिटीन मजिस्टे्ट के सामने पेश किया गया। लेकिन मुंबई अपराध ब्यूरो के अनुरोध पर मजिस्टे्ट ने उसकी गिरफ्तारी और रिमांड को रजिस्ट्र में दर्ज नहीं किया। इसी तरह सादिक शेख को 17 अगस्त को गिरफ्तार किया गया, लेकिन उसे 24 अगस्त को विस्फोटक, हथियारों व पांच अन्य के साथ गिरफ्तार दिखाया गया। विषेशों के अनुसार पकड़े गए आरोपियों के किसी भी मुकदमें का निस्तारण दो साल से कम समय में नहीं होगा। अलग-अलग मामलों में अलग-अलग जगहों से पकड़े गए आरोपियों के केस और लंबे खिचेंगे।
सवाल उठता है कि एक बूढ़ा पिता अपने बेटे को छुड़ाने के लिए कब तक लड़ेगा। गिरफ्तारी के एक साल बाद भी न तो आरोपियों पर आरोप तय हो सके हैं न ही मुकदमे षुरू हो सके हैं। उन्हें खुद को निर्दोष साबित करने में और कितना समय लगेगा? न्याय की धीमी गति को देखकर लगता है कि वह केस का अंत देख सकेंगे? यह सादिक शेख, अबुल बशर, मंसूर असगर, आरिफ बद्र या सैफुर रहमान के ही सवाल नहीं बल्कि उन 200 युवकों के सवाल भी हैं जो पिछले एक साल से जेलों में सड़ रहे हैं।

अनुवाद व प्रस्तुति- विजय प्रताप

सरकार बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए युद्ध लड़ना चाहती है

देश में नक्सल समस्या से निपटने के नाम पर सरकार अब आदिवासी बहुल इलाकों में सेना व वायु सेना का प्रयोग करने पर विचार कर रही है। गृहमंत्री ने पिछले दिनों पत्रकारों से बातचीत में अपनी इस मंशा का खुलासा किया। कई मानवाधिकार संगठनों, लेखक, पत्रकार, छात्र व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बहुराष्ट्रीय निगमों के पक्ष में नक्सलियों से युद्ध लड़ने का आरोप लगाया है। इसी मुद्दे पर बुधवार (21 अक्टूबर, 09) समाचार चैनल सीएनएन-आईबीएन पर एक बहस आयोजित की गई। इसमें सामाजिक कार्यकर्ता व लेखिका अरुंधति राॅय व झारखण्ड के सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डंगडंग ने भाग लिया। प्रस्तुत है उसका हिंदी रूपान्तरण।

सीएनएन-आईबीएन - नक्सली नेता किशन जी का साफ कहना है कि वो और हिंसक होंगे। ऐसे हिंसक वातावरण में आप कैसे आशा करेंगी की भारत सरकार वहां नक्सलियों से बातचीत करे। जिसकी की अरूंधति राॅय व अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं। हिंसा छोड़ने के बारे में आपका क्या कहना है?

अरुंधति - मैने वो पत्र देखा है, जिसमें मिस्टर चिदम्बरम ने नागरिक समूहों से नक्सलियों से हिंसा छोड़ने के लिए उन्हें फुसलाने को कहा गया है। मुझे लगता है कि यह कपट है। क्योंकि एक दुहरा वातावरण रचा जा रहा है। एक तरफ नक्सली हैं और दूसरी तरफ सरकार है। बीच में मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। यह सरलीकरण बहुत ही जटिल तस्वीर है। मैं नहीं मानती की मानवाधिकार कार्यकर्ता कोई अलग समूह से संबंधित है। अहिंसक व लोकतांत्रिक प्रतिरोधों का एक पूरा दायरा है। जिसे नक्सल कहा जा रहा है और मोलभाव की उम्मीद की जा रही है। इसलिए यदि सरकार नक्सलियों से कोई बातचीत करना चाहती है, तो उसे केवल उन्हीं से बातचीत करनी चाहिए।

सीएनएन-आईबीएन - सरकार विशेषरूप से नागरिक समूहों से कह रही है कि वो सीपीआई माओवादी से बात करें और उन्हें मुख्यधारा की राजनीति में लाए। इसमें गलत क्या है?

अरुंधति - मैं नागरिक समूह नहीं हूं। मैं एक एक्टिविस्ट हूं।

सीएनएन-आईबीएन - लेकिन मंगलवार कल को आप एक नागरिक समूह के रूप में ही लोगों के सामने आई और सरकारी हिंसा बंद करने की मांग कर रही थी।

अरुंधति राॅय - बिल्कुल। आप इसे उस ऐतिहासिक संदर्भ में देखे कि ऐसा क्यों हुआ। छत्तीसगढ़ जैसी जगहों पर नक्सली 30 सालों से हैं। यह स्थिति अभी क्यों बनी। जैसे की आवाजों की कोई लहर बह रही हो। वास्तविकता यह है और जो मेरा विष्वास भी है कि सरकार जंगलों को साफ करने के लिए युद्ध लड़ना चाहती है। क्योंकि झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में वह कई सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर कर चुकी है और उनकी जरूरतों को पूरा करना चाहती है।

सीएनएन-आईबीएन - गृहमंत्री ने कुछ महीनों पहले सीएनएन-आईबीएन से कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब में कहा था कि सरकार उन क्षेत्रों में विकास कार्य चाहती है, लेकिन जब हम सड़कें बनाते हैं नक्सली उसे ध्वस्त कर देते हैं, हम स्कूल बनाते हैं नक्सली उसे ध्वस्त कर देते हैं। वह सब कुछ ध्वस्त कर देना चाहते हैं। वहां कोई विकास कार्य नहीं होने देना चाहते। आप इसे दोहरा कह सकती हैं, लेकिन यह चिकन या अंडे के कौर जैसी स्थिति है। आप भारत सरकार से क्या उम्मीद कर सकती हैं जब विरोधी ताकत हथियार उठाए हो, पुलिस का सिर कलम कर रही हो और हिंसा की आड़ ले रही हो?

अरुंधति - दांतेवाड़ा के हिमांशु कुमार ने मंगलवार को सूचना के अधिकार के तहत सरकार से पूछा कि नक्सलियों ने कितने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, शिक्षकों व सामाजिक कार्यों में लगे लोगों की हत्या की। जवाब नहीं में था। क्या मिस्टर चिदम्बरम के विकास का मतलब वहां रह रहे लोगों के विकास से अलग है। मैं दांतेवाड़ा में थी और वहां सड़के बनते देखा। आप बताइए क्या वह सड़क नहीं है, जो आदिवासियों के चलने के लिए बनी है। लेकिन मैं सड़कों के लिए खनन के खिलाफ हूं।

सीएनएन-आईबीएन - तो क्या आप मानती हैं कि उस संदर्भ में हिंसा खत्म होनी चाहिए। वित्त मंत्री को साफ कहना है कि - जब तक माओवादियों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में हिंसा खत्म नहीं हो जाती बातचीत की बाधा दूर नहीं की जा सकती। अब अलबत्ता उन्हें हथियार छोड़ देना चाहिए।

अरुंधति - इसी को मैं कपट कह रही हूं। जब सरकारी बलों पर हमला होता है वह सरकारी बल जिसके पास सेना है, वायुसेना है को देष के सबसे गरीब लोगों का युद्ध मान लिया जाता है। यह कठिन है। लेकिन जब वह चीन से, पाकिस्तान से बात करना चाहते हैं उसका क्या। यह कैसी नीति है?

सीएनएन-आईबीएन -लेकिन हथियार किसके पास है? भारत सरकार कहती है कि नक्सली हथियारों से लैस हैं।

अरुंधति राॅय - सरकार के पास भी हथियार हैं।

सीएनएन-आईबीएन - तो नक्सली क्या करेंगे? वह तो पूरी तरह से हथियारों से लैस हैं।

अरुंधति राॅय - आप यह कैसे कह सकते हैं?

सीएनएन-आईबीएन - आप कह रही हैं कि गरीब लोग मारे जा रहे हैं। लेकिन नक्सली भी अपना नैतिक अधिकार 10-20 साल पहले ही खो चुके हैं, जब कि वो बच्चों की हत्याएं कर रहे थे, महिलाओं की हत्या कर रहे थे। कौन जिम्मेदार है इसके लिए?

अरुंधति राॅय- हिंसा के बारे में यह कोई भी नहीं कह सकती कि यह अचानक पैदा हो गई। दांतेवाड़ा में 644 गांव खाली करा लिए गए हैं। वर्श 2005 से साढ़े तीन लाख लोग गायब हैं।

सीएनएन-आईबीएन - एक हिंसा से दूसरी हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता है।

अरुंधति राॅय - बिल्कुल नहीं। लेकिन आप तुलना उनमें कर रहे हैं जहां एक तरफ कुछ के पास हवाई व नाभकिय ताकत है, सेना है, दूसरी तरफ कुछ गरीब लोग हैं।

सीएनएन-आईबीएन - अरुंधति राॅय का कहना है कि कोई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता नहीं मारी जा रही, लेकिन हम जानते हैं कि 659 लोग मारे जा चुके हैं। इसमें 259 पुलिसकर्मी व 400 आम नागरिक हैं। तो ग्लैडसन अब अपने मूल प्रष्न पर लौटते हैं। क्या अब आपको कहीं दूर-दूर तक वापस बातचीत की मेज नजर आ रही है?

ग्लैडसन - अब हम सही मुद्दे पर आए हैं। सरकार झारखण्ड में क्यों चीख रही है? मेरा ही उदाहरण लें- मेरे माता-पिता की नृषंस हत्या कर दी गई। बांध के नाम पर 20 एकड़ जमीन ले ली गई लेकिन हमें मुआवजा नहीं दिया गया। अगर मैं नक्सली बन जाता तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होता। आज भारत सरकार कल से आगे धावा बोलने जा रही है। सीआरपीएफ झारखण्ड के सबसे कम नक्सल प्रभावित क्षेत्र सिंहभूमि में प्रवेश के लिए तैयार है। वह सिंहभूमि से षुरूआत चाहते हैं। क्योंकि सरकार ने इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा 102 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए हैं।

सीएनएन-आईबीएन - आप कहना चाह रहे हैं कि सरकार उन काॅरपोरेट व बहुराश्ट्ीय निगमों की ओर से खेल रही है जो खुला जंगल चाहते हैं?

ग्लैडसन - हां-हां।

सीएनएन-आईबीएन - शायद यह कुछ विषेश क्षेत्रों के लिए सही हो लेकिन उन क्षेत्रों के लिए सही नहीं जो छत्तीसगढ़ से पष्चिम बंगाल तक रेड काॅरिडोर तक फेला है।

अरुंधति राॅय - अगर आप इस कथित रेड काॅरिडोर में खनिज संपदा के संग्रहण को देखे तो इसे भी आप सही पाएंगे। जिंदल, टाटा व एसआर, सभी ने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। जिस साल सलवा-जुडूम षुरू हुआ उसी साल इन सहमति पत्रों पर दस्तख्त किए गए।

सीएनएन-आईबीएन - लेकिन नक्सली लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेते हुए उन मुद्दों को क्यों नहीं उठाते? यही वह बिंदु है जिस पर गृहमंत्री और समय दे रहे हैं ताकि नक्सलियों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से फिर से जोड़ा जा सके। लेकिन यदि वह राज्य में कोई विष्वास ही नहीं रखते तो यह स्वाभाविक ही है कि भारतीय राजसत्ता उन्हें बलपूर्वक इसमें लाए।

अरुंधति राॅय - मैं दो बातें कहना चाहती हूं। एक तो हम 'नक्सली' शब्द का बहुत अगंभीरता से प्रयोग कर रहे हैं। सरकार ने साफ कह दिया है कि जो लोग सलवा जुडुम (जो कि एक रणनीतिक गांव है जिसका उपयोग वियतनाम युद्ध में हुआ था) के साथ हैं या सरकार के खिलाफ हैं।

सीएनएन-आईबीएन - सलवा जुडुम शायद पूर्ववर्ती सरकार की नीति थी। क्योंकि पिछले कुछ सालों से इसके बारे में नहीं सुना जा रहा है। उसी सरकार ने वर्श 2004 से नक्सलियों से बातचीत की दिशा में कदम बढाएं हैं।

अरुंधति राॅय - यही सच नहीं है। वो व्यक्ति जो सलवा जुडुम चल रहा है, वह कांग्रेस का आदमी है। एक नदी है इंद्रावती। उसकी दूसरी तरफ पाकिस्तान है। हम सभी से कहा जा रहा है कि अगर आप नदी पार करते हैं मार दिए जाएंगे।

सीएनएन-आईबीएन - मुख्य सवाल का जवाब दें। नक्सली लोकतांत्रिक प्रक्रिया में क्यों नहीं आना चाहते? हमे भूमि विस्थापन का मुद्दा उठाना चाहिए लेकिन लोकतांत्रिक बातचीत के जरिए।

अरुंधति राॅय - हमे यह देखना चाहिए कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया है क्या? भारतीय चुनाव अमरीकी चुनाव से मंहगा है। 99 प्रतिषत स्वतंत्र उम्मीदवार हार जाते हैं। अधिकतर सांसद करोड़पति हैं। अब आप किसी एक से जैसे ग्लैडसन से कहते हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आइए। जबकि उसके पास मीडिया में जगह खरीदने के लिए धन नहीं है, उसके पास काॅरपोरेट का पैसा नहीं है।

सीएनएन-आईबीएन - आप को लगता है कि चुनावी प्रक्रिया में एक भी ऐसा नहीं है जो आपकी आवाज सुने। यदि वे बहुत लोकप्रिय हैं, उनके मुद्दे जैसे भूमि विस्थापन बहुत नाजुक है, तो वह चुनावी प्रक्रिया में क्यों नहीं आते?

ग्लैडसन - बहुत से विस्थापित लोगों ने पिछली सरकार से बातचीत करनी चाही थी। लेकिन न तो षिबु सोरेन ने न ही राज्यपाल ने उनकी बात सुनी।

सीएनएन-आईबीएन - मैं जानता हूं की गृहमंत्री यह कार्यक्रम देख रहे हैं, क्योंकि हम उनके बारे में बात कर रहे हैं। आप उनसे क्या कहना चाहेंगे।

ग्लैडसन - मैं यही कहना चाहूंगा कि अगर आप नक्सलवाद के मुद्दे को हल करना चाहते हैं तो आपको आदिवासियों के आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक गैरबराबरी को हल करना होगा। तब आप विकास की बात करें।

सीएनएन-आईबीएन - अब यदि मिस्टर चिदम्बरम यह कहे कि यदि आप इन मुद्दों व विकास की बात करते हैं तो बंदूक छोड़े। आइए पहले बंदूके छोड़े और बात करें।

अरुंधति राॅय - आप के पास हजारों की संख्या में सुरक्षाबल है, पूरे क्षेत्र में भारी हथियार है। आप ने कई सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए हैं। यदि आप भारत के नक्षे पर देखें कि खान, जंगल व आदिवासियों का ढेर कहां तो सभी को एक दूसरे के उपर पाएंगे। और यदि आप चैकस हैं, नागरिक सेना गांवों में बलात्कार करे, महिलाओं की हत्या करे, जैसा की सलवा जुडुम की नीति है। और आप कहें की पहले आप बंदूके छोड़ दो फिर हम आए और आपकी जमीनों का अधिग्रहण कर ले, तो इससे आप क्या दिखाना चाहते हैं।

सीएनएन-आईबीएन - तो हम किसी निश्कर्श पर नहीं पहुंचे। एक चल रही हिंसा का जवाब दूसरी हिंसा से दिया जा रहा है।

अरुंधति राॅय - मुझे लगता है कि लोगों से यह वादा किया जाना चाहिए कि कोई विस्थापन नहीं होगा, सभी सहमति पत्र जनता के अनुरूप होंगे। इस क्षेत्र के विकास के लिए एक साफ नीति होनी चाहिए और जिस पर जनता के बीच बहस होनी चाहिए। उनके सुझाव लिए जाने चाहिए जिनके पास कुछ नहीं है। तब कोई बात हो सकती है।

सीएनएन-आईबीएन - तो आप का जवाब सरकार की उस अपील के संबंध में जिसमें नागरिक समूहों से सीपीआई माओवादी को बातचीत के लिए राजी करने के कहा गया है ‘ना’ है?

अरुंधति राॅय - आप ऐसा कैसे कह सकते हैं, मैं ऐसा कहने वाली कौन हूं। इसके लिए सरकार जिम्मेदार है। ये समूह काफी जटिल हैं।

सीएनएन-आईबीएन - आप चाहती है कि सारी जिम्मेदारी खुद सरकार उठाए। नागरिक समूहों व एक्टिविस्टों की कोई जिम्मेदारी नहीं है?

अरुंधति राॅय - हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन मुद्दों को उठाएं। लेकिन हम वह नहीं है जिसे जनता ने चुन कर भेजा है।

सीएनएन-आईबीएन - अंत में ग्लैडसन आप क्या कहना चाहेंगे?

ग्लैडसन - देखिए समस्या दो दषक पुरानी है। तब राजीव गांधी ने कहा था कि गरीबों तक सिर्फ 15 पैसा पहुंचता है, आज राहुल गांधी भी वही बात कह रहे हैं। मतलब की अभी तक कुछ नहीं हुआ है।

सीएनएन-आईबीएन - आप कह रहे हैं कि 25 सालों से देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया ठहर गई है?

ग्लैडसन- हां। दूसरी बात यह है कि जब प्रियंका गांधी राजीव गांधी के हत्यारों से मिलती हैं तो वह जनता की मसीहा जैसे पेश की जाती हैं, लेकिन जब कोई विनायक सेन आदिवासियों को इलाज करता है तो वह नक्सलियों का समर्थक बन जाता है। इसे न्यायपूर्ण कैसे कहा जा सकता?

सीएनएन-आईबीएन - यह एक काफी जटिल मुद्दा है जिसे हल करने के लिए काफी समय चाहिए। गहरा अंधेरा है जिसके पार हमे देखने की जरूरत है। कुछ लोगों का मानना है कि यह दुहरा मुद्दा है, एक तरफ नक्सल हैं दूसरी तरफ राज्य है। अरुंधति राॅय जैसे लोगों को शायद गृहमंत्री चिदम्बरम से बातचीत करनी चाहिए। लेकिन इसमें भी निष्चितता की कोई भावना नहीं है। एक आशा है कि कोई समाधान निकलेगा। अब समाधान की जरूरत है लेकिन यह भी जरूरी है कि हिंसा दोनों तरफ से बंद हो।

अनुवाद व प्रस्तुति- विजय प्रताप

सीएनएन-आईबीएन पर बहस की वीडियो देखें Govt at war with Naxals to aid MNCs: Arundhati

हम विकास विरोधी नहीं: कोबाड गाँधी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य कोबाड गाँधी को पिछले दिनों पुलिस ने दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया। उनकी गिरफ्तारी की सूचना मीडिया में आने के बाद उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने की तैयारी में लगी दिल्ली पुलिस को अपना इरादा बदलना पड़ा। मुंबई के पारसी परिवार में जन्मे गाँधी उस उच्च वर्ग से आते हैं जिसने दून स्कूल, सेंट जेवियर काॅलेज और लन्दन से पढ़ाई की। लंदन से लौटने के बाद उन्होंने कमेटी फार प्रोटेक्षन आफ डेमोके्रटिक राइटस (सीपीडीआर) के माध्यम से बदलाव की राजनीति में कदम रखा। बीबीसी बांग्ला की संवाददाता सुवोजित बाग्ची ने पिछले साल उनका एक साक्षात्कार लिया था। प्रस्तुत है उस साक्षात्कार का हिंदी अनुवादः

क्या माओवादी छत्तीसगढ़ में खुद को आगे बढ़ाने के लिए आदिवासियों को शिक्षित करने में जुटे हैं?
हम मोबाइल स्कूल के माध्यम से आदिवासियों को प्राथमिक शिक्षा देने की कोशिश कर रहे हैं। बच्चों को प्राथमिक स्तर पर विज्ञान, गणित व स्थानीय भाषा सीखा रहे हैं। हमारे लोग पिछड़े लोगों के लिए विशेष कोर्स तैयार करने में लगे हैं जिससे वह जल्दी सीख सकते हैं। हम स्वास्थ्य सेवाओं के विकास पर भी जोर दे रहे हैं। आदिवासियों को पानी उबाल कर पीने की सलाह देते हैं। इससे 50 प्रतिशत बीमारियां खुद ही कम हो जाती हैं। कई और गैर सरकारी संगठन भी ऐसा कर रहे हैं। महिलाओं के स्तर में सुधार के प्रयास किए हैं जिससे शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। इस क्षेत्र में विकास का स्तर सब सहारन अफ्रीका की तरह है।

तो क्या आप यह कह रहे हैं कि माओवादी लोगों की हत्या की बजाए उनकी मदद करते हैं?
हां। लेकिन हमारे देश के प्रधानमंत्री हमे मौत का कीड़ा (डेडलीस्ट वायरस) मानते हैं।

आप ऐसा क्यों सोचते हैं?
विकास के बारे में हमारी बिल्कुल साफ अवधारणा है। हमारा मानना है कि भारतीय समाज अर्ध सामंती व अर्ध औपनिवेषिक राज्य है और इसे लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत है। इसके लिए पहला कदम होगा कि जमीन जरूरतमंद को मिले। इसलिए हमारी लड़ाई भूमि हथियाने व गरीबों का शोषण करने वालों से है। हमारा विशेष ध्यान ग्रामीण भारत पर है।

छत्तीसगढ़ में आप लोगों को इतने संगठित रूप में कैसे जोड़े रखते हैं?
इसका एक मुख्य कारण है हम श्रम के सम्मान की बात करते हैं। उदाहरण के लिए यहां ग्रामीण बीड़ी बनाने के लिए तेंदू पत्ता इकट्ठा करते हैं। करोड़ों डाॅलर में यह उद्योग चल रहा है। हमारे यहां आने से पहले आदिवासियों की दैनिक मजदूरी 10 रुपए से भी कम थी। यहां भारत सरकार द्वारा तय दैनिक मजदूरी दूर की कौड़ी थी। हमने ठेकेदारों को मजबूर किया कि वह मजदूरी बढ़ाएं। हमने मजदूरी 3 से 4 गुना बढ़वाई। इसलिए लोग हमें पसंद करते हैं।

लेकिन इसका कारण यह भी है कि आपके पास सशस्त्र बल है?
मैं उसके बारे में कुछ ज्यादा नहीं बता सकता। क्योंकि मैं उस शाखा से नहीं जुड़ा हूं और उनके सदस्यों को भी नहीं जानता।

आप विकास की बात कर रहे हैं। क्या आप अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में सरकारी विकास कार्यों के लिए छूट देंगे?
क्यों नहीं। हम विकास कार्यों का विरोध नहीं करते। उदाहरण के लिए हमने कुछ स्कूलों के निर्माण का विरोध नहीं किया। लेकिन यदि स्कूल सैन्य छावनी में बदलने के लिए बनाए जा रहे हैं तो हम इसका विरोध करते हैं। भारत में ऐसा कई बार हो चुका है।

आप बंदूक के बल पर राजनीति करते रहेंगे?
बंदूक कोई मुद्दा नहीं है। उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे राज्यों के कई गांवों में इतनी बंदूके हैं, जितना पूरे देश मे माओवादियों के पास नहीं होंगी। सरकार और कुछ वर्ग हमारी विचारधारा से डरते हैं इसलिए हमें अपराधी की तरह पेश किया जाता है।

क्या माओवादियों के खिलाफ राज्य प्रायोजित हमले से आपके गढ़ का सुरक्षित रहना संभव है?
लड़ाई मुष्किल है। पूंजीवाद व सत्ता एक दूसरे में घुले-मिले हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही है और शोषण के मामलों में वृद्धि हो रही है। हम इसे संगठित करने में लगे।

आप कभी मुख्यधारा की राजनीति में भाग लेंगे?
नहीं। क्योंकि हम ऐसे लोकतंत्र में विष्वास करते हैं जो लोगों का सम्मान करे और उसे स्थापित करना इस देश में संभव नहीं।

साक्षात्कार को मूल रूप में पढ़ने के लिए क्लिक करें कोबाड गाँधी

अनुवाद व प्रस्तुति : विजय प्रताप

आँख से हटती पट्टी

विजय प्रताप

कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी डी दिनकरण पर आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप ने न्यायापालिका पर एक बार फिर प्रष्नचिन्ह लगा दिया है। इससे पहले गाजियाबाद भविष्य निधि घोटाला मामले में उच्च न्यायालय के दस जजों सहित 32 जजों पर 23 करोड़ रूपए डकार जाने के आरोप लगे थे। हालांकि अभी तक सभी आरोपों पर अंतिम निर्णय आने बाकी हैं, लेकिन इन घोटालों ने आम जनता की नजरों में न्यायापालिका की छवि जरूर धूमिल की है।
भारत में जहां अभी तक लोग न्यायाधीशों को भगवान की तरह मानते थे, पिछले दो दशक में कई ऐसी घटनाओं ने इस अस्था को तोड़ा है। आजादी के बाद देश में जब लोकतंत्र और सहायक संस्थाओं का पुनर्गठन किया जा रहा था, उस समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि न्याय करने वाला भी भ्रष्ट हो सकता है। इसीलिए संविधान में कार्यपालिका और विधायिका से जुड़े लोगों से संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने को कहा गया लेकिन न्यायापालिका को इससे अलग रखा गया। तब से अब तक के सफर में न्यायालयों के निर्णय तो कई बार बदले , एक ही नियम की अलग-अलग तरह से व्याख्या कर निर्णय सुनाए गए लेकिन इसमें कहीं भी यह आरोप नहीं लगा कि पिछला निर्णय किसी के दबाव में लिया गया था। यह सिलसिला नब्बे के दशक में तब टूटा जब पहली बार उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश पर महाभियोग लाने जैसी स्थिति बन गई। जस्टिस वी रामास्वामी जिन पर 1993 में लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया उन पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब व हरियाणा में मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहते हुए सरकार निधि का दुरूपयोग किया। कांग्रेस से उनकी नजदीकियों व दक्षिण भारतीय सांसदों के विरोध के चलते महाभियोग का प्रस्ताव पास नहीं हो सका, लेकिन बाद में रामास्वामी को इस्तीफा देना पड़ा। यह पहली घटना थी जिसने न्यायापालिका की शान पर बट्टा लगाया था। उसके बाद से न्यायापालिका पर ऐसे कई आरोप लग चुके हैं। यहां तक की पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस पी भरूच को यह स्वीकार करना पड़ा कि उच्चतम व उच्च न्यायालयों में 20 प्रतिशत जज भ्रष्ट हैं। अब सवाल यह उठता है कि 20 प्रतिशत भ्रष्ट हैं तो क्या 80 प्रतिशत सौ फिसदी खरे हैं। अगर यह हाल उच्चतम व उच्च न्यायालयों का है तो निचली अदालतों का क्या हाल है। न्यायापालिका के गठन के समय उसे दूध का दूध व पानी का पानी करने वाली ईमानदार संस्था मानकर उसे जांच के दायरे से बाहर रखा गया था। न्यायापालिका पर लगातार उठते सवालों के बीच अब लोगों ने यह मांग करनी शुरू कर दी है कि जजों को भी संपत्ति घोषणा के दायरे में लाया जाए। न्यायाविद्ों की माने तो एक न्यायाधीश तभी तक न्यायाधीश होता है जब वह किसी दूसरे के मामले का फैसला कर रहा होता है। अपने मामले में किसी भी जज को फैसला करने का अधिकार नहीं है। जजों को दिया जाने वाला वेतन भी जनता के टैक्स से आता है, ऐसे में जनता को भी पूरा अधिकार है कि वह जान सके कि किस जज ने दूध से मलाई उड़ाई है।
जनता के इसी दबाव व न्यायापालिका की छवि को उज्ज्वल बनाए रखने के लिए सरकार को भी मजबूरन न्यायाधीश संपत्ति घोषणा व उत्तराधिकार अधिनियम 2009 लाना पड़ा। इस अधिनियम में भी सरकार पर अधिकार सम्पन्न जजों का दबाव साफ देखा जा सकता है। अधिनियम के उपनियम-6 में जजों को अपनी संपत्ति की जानकारी सरकार को देने का प्रावधान है। इसे सूचना अधिकार के दायरे से भी बाहर रखा गया है। मतलब साफ है कि सरकार की मंषा साफ नहीं है। यह स्थिति भी तब है जब जजों पर भ्रश्टाचार के आरोपों की सूची लगातार लंबी होती जा रही है। एक तरफ सरकार की यह स्थिति है तो दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने खुद पहल करते हुए जजों की संपत्ति की घोषणा जैसा प्रंशसनीय कदम उठाया है। जरूरत है कि देश के बाकी न्यायालय भी जनता का विश्वास जितने के लिए ऐसे कदम उठाए।

नवरात्र.....नख दंत विहीन नायिका का स्वागत है !

गीताश्री

शक्ति की पूजा-आराधना का वक्त आ गया है। साल में दस दिन बड़े बड़े मठाधीशों के सिर झुकते हैं..शक्ति के आगे। या देवि सर्वभूतेषु....नमस्तस्ये..नमो नम...। देवी के सारे रुप याद आ जाते हैं। दस दिन बाद की आराधना के बाद देवी को पानी में बहाकर साल भर के लिए मुक्ति पा लेने का चलन है यहां। फिर कौन देवी...कौन देवी रुपा.
ये खामोश देवी तभी तक पूजनीय हैं, जब तक वे खामोश हैं...जैसे ही वे साकार रुप लेंगी, उनका ये रुप हजम नही होगा..कमसेकम अपनी पूजापाठ तो वे भूल जाएं।
आपने कभी गौर किया है कि शक्ति की उत्पति शक्तिशाली पुरुष देवों के सौजन्य से हुई है। इसमें किसी स्त्री देवी का तेज शामिल नहीं है। शंकर के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से मस्तक के केश, विष्णु तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से स्तन, इंद्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी(यहां अपवाद है) के तेज से नितंब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से दोनों पैरों की उंगलियां, प्रजापति के तेज से सारे दांत, अग्नि के तेज से दोनों नेत्र, संध्या के तेज से भौंहें, वायु के तेज से कान तथा अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न भिन्न् अंग बनें....।
कहने को इनमें तीन स्त्रीरुप हैं..अगर उनके पर्यायवाची शब्द इस्तेमाल करें तो वे पुरुषवाची हो जाएंगे। इसलिए ये भी देवों के खाते में...। ये पुरुषों द्वारा गढी हुई स्त्री का रुप है, जिसे पूजते हैं, जिससे अपनी रक्षा करवाते हैं, और काम निकलते ही इस शक्ति को विदा कर देते हैं। इन दिनों सारा माहौल इसी शक्ति की भक्ति के रंग में रंगा है...जब तक मू्र्ति है, खामोश है, समाज के फैसलों में हस्तक्षेप नहीं करती तब तक पूजनीया है। बोलती हुई, प्रतिवाद करती हुई, जूझती, लड़ती-भिड़ती मूर्तियां कहां भाएंगी।
हमारी जीवित देवियों के साथ क्या हो रहा है। जब तक वे चुप हैं, भली हैं, सल्लज है, देवीरुपा है, अनुकरणीय हैं, सिर उठाते ही कुलटा हैं, पतिता हैं, ढीठ हैं, व्याभिचारिणी हैं, जिनका त्याग कर देना चाहिए। मनुस्मृति उठा कर देख लें, इस बात की पुष्टि हो जाएगी।
किसी लड़की की झुकी हुई आंखें...कितनी भली लगती हैं आदमजात को, क्या बताए कशीदे पढे जाते हैं। शरमो हया का ठेका लड़कियों के जिम्मे...।
शर्म में डूब डूब जाने वाली लड़कियां सबको भली क्यों लगती है। शांत लड़कियां क्यों सुविधाजनक लगती है। चंचल लड़कियां क्यों भयभीत करती हैं। गाय सरीखी चुप्पा औरतों पर क्यों प्रेम क्यों उमड़ता है। क्योंकि उसे खूंटे की आदत हो जाती है, खिलाफ नहीं बोलती, जिससे वह बांध दी जाती है। जिनमें खूंटा-व्यवस्था को ललकारने की हिम्मत होती है वे भली नहीं रह जाती। प्रेमचंद अपनी कहानी नैराश्यलीला की शैलकुमारी से कहलवाते हैं..तो मुझे कुछ मालूम भी तो हो कि संसार मुझसे क्या चाहता है। मुझमें जीव है, चेतना है, जड़ क्योंकर बन जाऊं...।
आगे चलकर से.रा.यात्री की कहानी छिपी ईंट का दर्द की नायिका घुटने टेकने लगती है--हम औरतों का क्या है। क्या हम और क्या हमारी कला। हमलोग तो नींव की ईंट हैं, जिनके जमीन में छिपे रहने पर ही कुशल है। अगर इन्हें भी बाहर झांकने की स्पर्धा हो जाए तो सारी इमारत भरभरा कर भहरा कर गिर पड़े।...हमारा जमींदोज रहना ही बेहतर है .....।
लेकिन कब तक। कभी तो बोल फूटेंगे। बोलने के खतरे उठाने ही होंगे। बोल के लब आजाद हैं तेरे...। कभी तो पूजा और देवी के भ्रम से बाहर आना पड़ेगा। अपनी आजादी के लिए शक्ति बटोरना-जुटाना जरुरी है।
ताकतवर स्त्री पुरुषों को बहुत डराती है।
जिस तरह इजाडोरा डंकन के जीवन के दो लक्ष्य रहे है, प्रेम और कला। यहां एक और लक्ष्य जो़ड़ना चाहूंगी...वो है इन्हें पाने की आजादी। यहां आजादी के बड़े व्यापक अर्थ हैं। पश्चिम में आजादी है इसलिए तीसरा लक्ष्य भारतीय संदर्भ में जोड़ा गया है। एक स्त्री को इतनी आजादी होनी चाहिए कि वह अपने प्रेम और अपने करियर को पाने की आजादी भोग सके। यह आजादी बिना शक्तिवान हुए नहीं पाई जा सकती। उधार की दी हुई शक्ति से कब तक काम चलेगा। शक्ति देंगें, अपने हिसाब से, इस्तेमाल करेंगे अपने लिए..आपको पता भी नहीं चलेगा कि कब झर गईं आपकी चाहतें। ज्यादा चूं-चपड़ की तो दुर्गा की तरह विदाई संभव है। सो वक्त है अपनी शक्ति से उठ खड़ा होने का। पीछलग्गू बनने के दिन गए..अपनी आंखें..अपनी सोच..अपना मन..अपनी बाजूएं...जिनमें दुनिया को बदल देने का माद्दा भरा हुआ है।
इस बहस का खात्मा कुछ यूं हो सकता हैं।
सार्त्र से इंटरव्यू करते हुए एलिस कहती है कि स्त्री-पुरुष के शक्ति के समीकरण बहुत जटिल और सूक्ष्म होते हैं, और मर्दो की मौजूदगी में औरत बहुत आसानी से उनसे मुक्त नहीं हो सकती। जबाव में सार्त्र इसे स्वीकारते हुए कहते हैं, मैं इन चीजों की भर्त्सना और निंदा करने के अलावा और कर भी क्या सकता हूं।

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