फिलिस्तीनी बच्चे के लिए लोरी

जंगशुदा फिलिस्तीन के लिए जिसके रग-रग में अपने अस्तित्व के को बचाए रखने का जज्बा है। जहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश का एक सिपाही है. साम्राज्यवाद विरोधी जंग में वे अपने देशवाशियों के साथ लड़ रहे हैं कि जो बाकि दुनिया को भी लड़ने का हौसला दे रहे हैं. उनके लिए फैज़ कि यह कविता -

मत रो बच्चे
रो रो के अभी
तेरी अम्मा की आँख लगी है
मत रो बच्चे
कुछ ही पहले
तेरे अब्बा ने
अपने गम से रुखसत ली है
मत रो बच्चे
तेरा भाई
अपने ख्वाब की तितली पीछे
दूर कहीं परदेस गया है
मत रो बच्चे
तेरी बाजी का
डोला पराये देस गया है
मुर्दा सूरज नहला के गए है
चंद्रमा दफना के गए है
मत रो बच्चे
अम्मी,अब्बा,बाजी,भाई
चाँद और सूरज
तू गर रोयेगा तो ये सब
और भी तुझे रुलायेंगे
तू मुस्कयेगा तो शायद
सारे एक दिन भेस
तुझ से खेलने लौट आयेंगे
__ फैज़ अहमद फैज़

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